गुरूभक्त बालकथा (उपमन्यु की कहानी)


हमारे देश में गुरू को भगवान का इस्थान प्राप्त है।  हमारे पालन पोसड का कार्य माता पिता व भावी जीवन का निर्माड गुरु ही करते है। 

छात्र को गुरु से माता पिता का प्यार और विद्या प्राप्त होती है, जिसके अगर पर छात्र अपने पूरे जीवन का निर्माड करता है। तभी तो कहा जाता है 

गुरू ही व्रह्मा गुरू ही विष्णु: गुरू देवो महेश्वराय: ।
गुरू: साछात परवरामहा तस्मै श्री गुरवै नम :।।

प्राचीन समय से ही हमारे देस में गुरू का सम्मान होता आ रहा है तथा समय – समय पर हमारे देश में ऐसे बालको ने जन्म लिया है, जिन्होंने अल्पायु में ही संसार के समछ गुरू भक्ति के आदर्श उदाहरड़ किया है। 

उन्होंने गुरू सेवा को सवसे पहले माना और प्राडो तक की परवाह नहीं की। उनका नाम सुनहरे अछरो में लिखा गया है। ऐसे ही एक बालक उपमन्यु के बारे में बताया गया है। 

उपमन्यु की कहानी

धौम्य नाम के एक ऋषि थे। उनके आश्रम में बहुत से विद्यार्थी अध्यन करते थे। उस समय उनके गुरू जी अनेक प्रकार की परीछा लेते थे। उनके विद्यार्थी में एक उपमन्यु भी था। एक दिन उन्होंने उपमन्यु की परीछा लेनी की सोची। 

उस समय आश्रम में शिछा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी भिच्छा मांगकर लाते और उसे सभी विद्यार्थी एकत्र कर गुरू जी के साथ कहते थे। उपमन्यु भी भिच्छा मांगने जाता था। 

एक दिन गुरू जी ने उपमन्यु को अपने पास बुलाया और कहा कल से तुम्हे जो कुछ भी प्राप्त हो वह उसमे से स्वयं कुछ भी न खाये। उपमन्यु गुरू जी की आज्ञा मन कर अगले दिन से भिच्छा में जो कुछ भी मिलता उसमे से उपमन्यु कुछ भी नहीं खता। 

गुरूभक्त बालकथा

कुछ दिन बीत जाने पर गुरू जी ने उसे फिर अपने पास बुलाया और पूछा वह अपने लिए भोजन की व्यवस्था कहा से करता है।  उपमन्यु ने बताया वह पुनः जाकर भिच्छा मांगता है, और उससे अपना पेट भरता है। गुरू जी ने कहा की दूसरी बार भिच्छा मग्न तो पाप है। अब तुम ऐसा नहीं करोगे। उपमन्यु ने गुरू जी की आज्ञा मन कर उसने दिन से दूसरी बार भिच्छा मांगना बंद कर दिया। 

कुछ दिन पश्चात गुरू जी ने पुपमानयु को फिर बुलाया और कहा अब वह अपना पेट कैसे भरता है। उपमन्यु ने जवाब दिया की दूध दुहने के बाद जो शेष दूध गाय के पचड़े के लिए रहता है , उसे पीकर वह अपनी भूख संत करता है। गुरू जी ने कहा दूसने का हक़ छीनना पाप है। आगे से तुम इस प्रकार दूध नहीं पियोगे। 

कुछ दिन बाद उपमन्यु को गुरू जी ने फिर बुलाया और पूछा अब वह अपनी भूख कैसे संत करता है उपमन्यु न बताया जब गाय घास खाकर जुगाली करती है तो उसके मुँह  जुगाली करते समय जो झाग निकलता है, वह उसे खाकर अपनी भूख मिटाता है।  गुरू  ऐसा न करने  को कहा। 

गुरु की आज्ञा कहानी

अब उपमन्यु अपनी भूख जंगल में में जाकर घास और पत्ते खाकर अपना पेट भरता था।  एक दिन उपमन्यु ने अपनी भूख मिटने के लिए जंगल में उगे आक के पत्ते खा लिए। 

पत्ते खाने से वह अँधा हो गया और जंगल के सूखे कुए में जाकर गिर गया वह कुए से नहीं निकल पाया और अपने आश्रम में नहीं जा पाया। गुरू जी को मालूम पड़ा की उपमन्यु नहीं आया तो वह अपने विघार्थी  लेकर जंगल में ढूढ़ने निकल पड़े। गुरू जी को पास के कुए से किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी। 

गुरू जी उस कुए के पास पहुंचे , और कुए  झक कर देखा तो उपमन्यु कराह रहा था। अनेक प्रयासों के पश्चात गुरू जी  व् अन्य विघार्थीओ ने उपमन्यु को कुए से बहार निकल लिया। 

उपमन्यु की गुरुभक्ति

गुरू जी आज्ञा का पालन करने वाले अपने विद्यार्थी को अपने सीने से लगा लिया। इस प्रकार उपमन्यु परीछा में सफल हो गया और गुरू  के प्रयासों से उपमन्यु पुनः देखने लगा। 

सीख — गुरू जी की आज्ञा मानना प्रत्येक विद्यार्थी का कर्त्तव्य है और उसको जरूर करना चाहिए।

Published by Kaushlendra Kumar

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