मातृ भूमि – भारत


मातृ भूमि – भारत 

भारत अपना प्रिय देश, विश्व का सबसे प्राचीन देश है। विश्वा के समस्त देश एवं उनकी संस्कृतियाँ नष्ट हो गयी, लेकिन भारत के ऋषि हमारी संस्कृति को मचने में समर्थ हुए।

सृष्टि की पुनः रचना हुई। हमारे आदिपुरुष मनु और शतरूपा ने इस भूमण्डल को जीवन दिया। मनु की ही संताने हम सब मनुज या मानव कहलाए।

ऋषियो ने इसको सुरलोक से भी अच्छा बताया है। जहा जन्म लेने के लिए देवता भी लालायित रहते है। देवता लोग भी निरंतर यही गया करते है, गायन्ति देवा किल गीत कनि, धन्यास्तु तो भारत भूमि भागे। 

मातृभूमि का महत्व

अर्थात जिन्होंने इस स्वर्ण भूमि भारत वर्ष में जन्म लिया है, वे पुरुष हम देवताओ की उपेक्षा अधिक सौभाग्यशाली है। प्रकृति ने इनकी अद्वितीय रचना की है। 

पूर्व में इनकी सीमाए वृहम प्रदेश से आगे समुद्री द्वीपों तक,पश्चिम में अफगानिस्तान को पार कर रही थी। पूर्व में बगला देश व पश्चिम में पाकिस्तान हमारे देश के अभिन्न्य अंग थे।

 उतर में तिब्बत तक एवं दक्षिण में हिन्द महासागर की तरंगो को घेरे “श्रीलंका” एवं  “लक्षद्वीप” तक जाती थी।

मेरी मातृभूमि

प्रतेक भारतीयों को यह देश प्राणो से प्यारा है। इसका कण कण पवित्र है। तभी तो प्रत्येक भारतीय गता है। कण कण में सोया शहीद, पत्थर पत्थर इतिहास है। 

इस भूमि पर पग पग में उत्सर्ग और शौर्य का इतिहास अंकित है। यही वह पूर्ण भूमि है, जिसका कण कण, ज्ञान भक्ति और तपोमय कर्म से पवित्र है।

मातृभूमि स्वर्ग से महान है

यही परमेश्वर ने दस अवतार भरण कर बार बार अवतरित होकर विस्वा का कल्याण किया। इसी पूर्ण भूमि के लिए भगवन रामचंद्र लंका के राज्य को
अविष्कार करते हुए कहा था।

“अपीश्वरंमयी लंका, न मै लक्ष्मण रोचते”
     जननी जन्म भूमिस्च, स्वर्गदपि गरीयसी”।।


अपनी इस महिमामयी, पवित्र मातृभूमि के भारत वर्ष, आर्यावर्त, भरतखण्ड, हिंदुस्तान आदि अनेक नाम है। अपनी मातृभूमि के प्रति कितनी श्रद्धा होती है, वह के रहने वालो में। क्यों न हो ? माँ के जीवन का ही अंश दूसरी संतान
है, तभी देश भक्त गेट है। 

सुंदर होंगे देश बहुत से, बहुत बड़ी है यह घरती।
पर अपनी माँ तो अपनी ही है, अंतिम क्यार है जो करती।। 

इच्छा है इस जन्म भूमि पर शत शत बार जन्म ले हम। 
शत शत बार इसी की सेवा में, अपना जीवन दे हम ।।


हमारा देश काफी समय तक विदेशियों का गुलाम रहा है. १५ अगस्त 1947 से पहले देश पूर्ण रूप से दस्ता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। भारतीयों को अपमानित किया जा रहा था। इसी बिच एक क्रन्तिकारी आया जिसका नाम था — राम प्रसाद बिस्मिल।

मेरी मातृभूमि मंदिर है

बिस्मिल के हृदय में देश को स्वतन्त्र करने की आग भड़क रही थी, जो हथियारों से ही बुझाई जा सकती थी। स्वतंत्रता सेनानियों के पास हथियारों की कमी थी, जिसके लिए धन की अवसक्ता थी और अग्रेज भारतीय धन एकत्र कर विदेश भेज रहे थे। 

राम प्रसाद बिस्मिल ने उत्तर प्रदेश के काकोरी इस्टेसन पर ट्रेन से ले जाते हुए सरकारी खजाने को लूट कर हथियारों के लिए धन प्राप्त करने की योजना बनाई। 

मातृप्रेम

इसमें एक नवयुवक असफाक उल्लाखा ने बिस्मिल का साथ दिया।  एक ब्राह्मण और दूसरा मुस्लमान दो सरीर में एक जान। दोनों में मिलकर खजाना लुटा। यह दुर्घटना “करोली कांड” के नाम से प्रसिद्ध हुई। 

काकोरी कांड में दोनों को फैजाबाद जेल में बंद किया गया। दोनों जवानो को जालिमो ने फांसी की सजा दी। 

माझी मातृभूमी

हमें उस अमर सहीदो और स्वतंत्रता सेनानियों को कभी नहीं भूलना चाहिए क्योकि उन्ही के त्याग और क़ुरबानी के कारन हमने आजादी को गले लगाया है। यह आजादी हमें बिरासत के रूप में हमें प्राप्त हुई है। 

देश प्रेम

इसकी देख भाल करना प्रत्येक भारत वासियो का कर्त्तव्य है। घ्यान रहे अभी हमारी यात्रा समाप्त नहीं हुई है। यह आज भी जारी है अभी हमें इसे राम राज्य में बदलना है। जिसके लिए प्रत्येक नागरिको का सहयोग अपेच्छित है। 

देश निर्माण की लड़ाई, आजादी की लड़ाई से भी दुस्कर है। इसके लिए प्रत्येक भारतीय बूढ़े, बच्चे और जवान को कमर कास कर लड़ाई लड़नी है क्योकि यह घरती है अपनी, यह देश अपना है। 

 Published by Kaushlendra Kumar
   

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